जनाजे में तो......

रंज की गुफ्तगू से क्यो रिश्ते में दाग
मोहब्बत की आरजू में ही परवाने जलते है
मुस्कुराकर मिलो सबसे, चार पल की ज़िन्दगी है
वरना ज़नाजे में तो सभी साथ चलते है!!!!

दूसरे के ज़ख्म पर तू लतीफे लिखता है
वो भी तेरे ज़ख्म नमक से भरते है
ज़ख्मो को पिरो दे, बना सबको मुस्तफा
वरना ज़नाजे में तो सभी साथ चलते है!!!!!

बदन की चाह रख, ख़ुद को आशिक कहता है
ऐसे तो यहाँ सिर्फ़ बाजारों में फिरते है
इश्क इबादत है,पाक है, उसे रूह से कर
वरना ज़नाजे में तो सभी साथ चलते है!!!!!

4 comments:

  1. ...And here is another one of the philosophical parody. Nice one again.
    I liked the theme and the main line..
    वरना ज़नाजे में तो सभी साथ चलते है!!!!
    Really well thought and said.

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  2. nice poem abhishek....keep it up

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