कसक....

चिलम सी जलती सब की जिन्दगी
खुदा को नशा करने का खुमार है
कुछ धुआ बन आसमान में जगमगा रहे
हम साथ जलकर भी धूल में मिली राख है...

चिंगारी इतनी थी नहीं की हम धुआ बन पाते
बस बेफिक्री के आलम में रहे युही वक़्त गंवाते
वक़्त दर वक़्त भी हमे सिखला सका
खुद से झूट बोलते और फिर दुनिया से लजाते...

खुद से करी बेवफाई एक 'कसक' उठाती है
ये कसक एक फितूरी चिंगारी जलाती है
खुदा के लिए अब राख का चिलम लगाओ
आज की ये राख कल धुआ बन जगमगाती है........




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