Regret......

 हम बेवजह रात के इंतज़ार में फ़ना हो गए
वरना शाम भी बहुत हसीन  थी गुज़ारने को
मुद्दतो से नाकामी को दुआ देते रहे
और दोजको से उठती दुआ लेते रहे
शरबत की ख्वाइश में रेगिस्तान हो गये
वरना अश्क ही काफी था तुम्हारा मेरी प्यास भुजाने को ....

हम  बेवजह गूंजते कमरों का आशियाँ  बना बैठे
वर्ना  बाहें ही तुम्हारी काफी थी सुकून पाने को
ख्वाइश थी तुम्हारी मुझसे एक गुल पाने की
करती थी दर्ख्वास्त कायनात से हमको मिलाने की
इश्क को मन बहलाने का जरिया समझ बैठे
जहन्नुम में भी नहीं जगह है ऐसे काफिर सयाने को
हम बेवजह रात के इंतज़ार में फ़ना हो गए
वरना शाम भी बहुत हसीन  थी गुज़ारने को .........




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