ehsaas na ho....

न तो सहर कही भटकी है
न बक्शी खुद ने मेहेरबानी है
क्या जिक्र किसी से करे
जब खुद को ही हैरानी है
एहसास किया तो इश्क़ है
वरना रोज़ कि जिंदगानी है !!!

वैसे तो टउल्लुक़ात है कुछ पहरो का
पर लगता अब क्यों रूहानी है
दीवाने आम की शिरकत
उसकी अब ख़ास में मनमानी है
एहसास किया तो इश्क़ है
वरना  रोज की जिंदगानी है !!!!

अब उलझन बड़ी पेचीदा है
ये तब्बस्सुम बिना खिले मुरझानी है
अब एहसास ही करना छोड़ दिया
कही कोने में दफन ये कहानी है
एहसास किया था तो इश्क़ था
अब रोज कि जिंदगानी है !!!!