जियो जूनून की हद तक!!!!!!

शमशीर की धार पर चला लो मुझे
इतनी तौफीक रखता हूँ
रकीब कितना खफा सही
उसकी बज्म में नज़्म पढता हूँ
सिर्फ़ खुदा के आगे सजदा हूँ
मैं जूनून की हद तक जीता हूँ!!!


दीवान--ख़ास सभी यहाँ पर
खुशामद नही दुआ सलाम करता हूँ
फिजा में थोड़ा रंज सही पर गम नही
ऐसा फतवा जारी करता हूँ
सिर्फ़ खुदा के आगे सजदा हूँ
मैं जूनून की हद तक जीता हूँ!!!!


इंतकाम इंतज़ार के तो सभी मारे है
मैं तो हालात को फना करता हूँ
झील में तो बाकी आशिक फिरते है
मैं तो दरिया को भी रूमानी रखता हूँ
सिर्फ़ खुदा के आगे सजदा हूँ
मैं जूनून की हद तक जीता हूँ!!!!!

प्रेयसी ........

विचार दृढ, स्वभाव शीतल
महत्वकांशी उड़ान की वाहिनी हो
त्वचा कोमल, अदभूत सौंदर्य
खिले कपोल, चंचल मृगनयनी हो
मैं नतमस्तक निस्वार्थ प्रेमी हूँ
मेरी कविता, मेरे गीतों की रागिनी हो!!!



संस्कारी गुण, स्वतंत्र आचार
विषमता में भी धीर धारिणी हो
प्रेरणादायी जीवन, तुम उच्च शिक्षित
कर्मठता की सारिणी हो
मैं नतमस्तक निस्वार्थ प्रेमी हूँ
मेरी कविता, मेरे गीतों की रागिनी हो!!!!१


नव वस्त्र शौकीन, नृत्य चेतनात्मक
मुस्कुराती तुम पवित्र क्रोधाग्नि हो
परस्पर सहयोग, भावनात्मक हृदय
प्रेम विमुख, मेरे दुखो की तारिणी हो
मैं नतमस्तक निस्वार्थ प्रेमी हूँ
मेरी कविता,मेरे गीतों की रागिनी हो!!!!

शायर की मोहब्बत!!!!!!..

जो होना था उसकी फरमाइश थी
जो हुआ उसकी कहाँ ख्वाइश थी
साकी से नफरत करने लगा शायर
भूल गया होश में ही चोट खाई थी!!!!!


खता तुझसे कभी होती नही
फ़िर भी फरियाद तेरी वो सुनती नही
अब तो मोहब्बत कर बैठा शायर
पहले सोचना था जब ये आग लगायी थी!!!!


तुझे उसे कहना बहुत कुछ है
लफ्जों की तुझमे कहाँ कमी है
फ़िर भी खामोश रहता है शायर
सब बेवफा, जिसने साथ दिया तन्हाई थी!!!!


इल्म होता नही उसको बेकरारी का
फिजूल ही लुत्फ़ उठाती है शायरी का
एक इकरार करता है आज शायर
अल्फाज़ की दुनिया उसी के लिए सजाई थी!!!!!!

when propose is rejected....

बरसती चांदनी सब पर
चाँद किसी को मिलता नही
लपट सीने में ऐसी है
लोहा पिघले,दिल पिघलता नही
बदरंग लगती है जो
ये शाम सिन्दूरी है
शायर, एक बार फ़िर
प्रेम कहानी रह गई अधूरी है!!!


उनके नैनो की भाषा
काश हम सही समझते
इशारे उनके कुछ नही थे
हम यू ही दीवाने बनते
तौफीक इज़हार का जो कर बैठे
अब महखाने के हम ही एक दिखते फितूरी है
शायर, एक बार फ़िर
प्रेम कहानी रह गई अधूरी है!!!!!!

पंछी...

अरनवी का इस्तकबाल करता हूँ
मुझे चूमती सूरज की लालिमा है
दाना पानी खुदा की नेमत
फ़िर भी निकल पड़ता मेरा कारवां है
पतंग नही डोर से लिपट उडू
मेरी तम्मना उड़ान,रखना निचे जहान है
चाहे पंछी हूँ या ख्वाब हूँ
आसमान ही मेरा आशियाँ है!!!!


हवा का रुख चाहे विरूद्ध हो
पंखो को नही समेटना है
मुझे अपनी डाली का पता याद है
सांझ पड़े वही वापस लौटना है
धरती पर सबके ठिकाने है
यहाँ तो मैं हूँ,मेरा पूरा आसमा है
चाहे पंछी हूँ या ख्वाब हूँ
आसमान ही मेरा आशियाँ है!!!!!!