ये शब्दों का दायरा मेरा
सिमटना चाहता है उन क्षणों में
न कवि का अंश न मनुष्य का दम्भ
जहा मैं हूँ और बस मैं हूँ। ।
ये यादों का मिटटी का गुल्लक मेरा
बिखरना चाहता है उन कणो में
न द्वेश भाव न किसी की प्रीत का राग
जिसमे मैं हूँ और बस मैं हूँ। …
ज़माने से बंधा अश्को का सागर मेरा
अब बहना चाहता है उन लहरों में
न शर्मिंदगी का दलदल न गर्व का पर्वत
डूबा लहरों में मैं हूँ बस मैं हूँ। ।
सिमटना चाहता है उन क्षणों में
न कवि का अंश न मनुष्य का दम्भ
जहा मैं हूँ और बस मैं हूँ। ।
ये यादों का मिटटी का गुल्लक मेरा
बिखरना चाहता है उन कणो में
न द्वेश भाव न किसी की प्रीत का राग
जिसमे मैं हूँ और बस मैं हूँ। …
ज़माने से बंधा अश्को का सागर मेरा
अब बहना चाहता है उन लहरों में
न शर्मिंदगी का दलदल न गर्व का पर्वत
डूबा लहरों में मैं हूँ बस मैं हूँ। ।