न मुक्कमल पाने की ख्वाहिश है
न बेहिसाब अय्याशी की फरमाईश है
होश की फिजा से घुटन होती है
शाम होते ही प्याले गटकता हूँ
चाँद की राह तकता हूँ
मैं रात का इंतज़ार करता हूँ
धूप में जिंदगी के संघर्ष की तपन है
छाँव दूर खड़ी है अपने में मग्न है
दिन में देखो जिन्दगी पहेली है
रात होती है तो जिंदगी को समझता हूँ
चाँद की राह तकता हूँ
मैं रात का इंतज़ार करता हूँ
दिन में परछाई की वफ़ा सबको मिलती नही
दिल नही लगा हमसे तो परछाई की गलती नही
रात में तो हर प्रेमी रोता है
कहता है अंधेरे में परछाई को तरसता हूँ
चाँद की राह तकता हूँ
मैं रात का इंतज़ार करता हूँ.......
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ReplyDelete"धूप में जिंदगी के संघर्ष की तपन है
छाँव दूर खड़ी है अपने में मग्न है"
ek time tha jab hum bhi raat ka intazaar karte the..
ab to raat din aur din raat se lagte hai..:P
this is awesome...
ReplyDeletei like each line of this poem but specially..
"din me dekho to zindagi paheli h
raat hoti h to zindagi ko samajhta hu"
ALL THE BEST..